मेरे अरमान.. मेरे सपने..


Click here for Myspace Layouts

शनिवार, 1 जुलाई 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 7 )



*यात्रा जगन्नाथपुरी* 
 भाग 7 
भुवनेश्वर भाग -- 2

उदयगिरि की गुफायें -- हाथी गुफ़ा 



28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी |

1 अप्रैल 2017 
हमने दो दिन खूब पुरी घूमा ,सूर्यमंदिर देखा और  भी यहाँ के अन्य धार्मिक स्थल देखे।  अब हमने भुवनेश्वर  को प्रस्थान किया ,पूरी से चलकर हम रस्ते के पीपली गाँव रूककर वहां से उड़ीसा की फ़ेमस पेंटिंग्स खरीदते हुए भुवनेश्वर पहुंचे ,हमको जो ऑटो वाला पुरी से लाया था उसने हमको लिंगराज मंदिर के सामने छोड़ दिया क्योकि हम महेश्वरी धर्मशाला ढूँढ रहे थे और वो लिंगराज मंदिर के पास ही थी लेकिन वहां हमको सीलनभरे रूम मिल रहे थे और उनका किराया भी ज्यादा था नार्मल रूम का 300 रु और  ऐ. सी. रूम का 500 रु वो हमको ज्यादा लगा इसलिए हमने नजदीक एक दो होटल और देखे पर कुछ समझ नहीं आये फिर किसी ने सुझाव दिया की आप स्टेशन के नजदीक ही होटल देखे वहां अच्छे होटल मिल जायेगे और हम एक ऑटो  में बैठ चल दिए। 

होटल राधा किशन में हमको ऑटो वाला लाया हमको रूम पसंद आया जो सिर्फ 1500 रु में था छोटा था पर ऐ,सी. था और  हम पांचो को कम्फर्ट था अपना सामान वही पटक हम फ्रेश हो निकल पड़े धौली गिरि शांति स्तूप देखने।  ऑटो होटल वाले ने ही कर दिया था जो हमको धौली गिरि शांति स्तूप , उदयगिरि, खंडगिरि  और लिंगराज मंदिर दिखाने  वाला था। 

सबसे पहले हम धौली गिरि शांतिस्तूप देखने पहुंचे। गर्मी अपनी चरम स्थति में थी गर्मी भी बहुत थी ज्यादा रुके नहीं वही एक पेड़ के नीचे बैठ गये लेकिन हमारे दोनों जग्गा जासूस स्तूप की कई सीढिया चढ़कर ऊपर पहुंच गए फिर हमने भी दूर से कई फोटू खिचवाये। 

धौली गिरि शांतिस्तूप का इतिहास ;---

धोलीगिरि शांति स्तूप  धोलीगिरि हिल्स पर स्थित है  और भुवनेश्वर से 8 किलोमीटर दूर दया नदी के नजदीक बना हुआ है इसके नजदीक काफी खुला मैदान है और एक छोटी सी पहाड़ी है पहाड़ी के शिखर पर अशोक के शिलालेख लिखे हुए है  1970  क़े दशक में जापान के एक बोध्य संध ने  यहाँ एक सफ़ेद शांति स्तूप बनवाया जिसे हम देखने गए। 

उदयगिरि की गुफाये;---- 

यहाँ से हम ऑटो में बैठ उदयगिरि की गुफाये देखने को चल दिए।  हमको दूर से ही एक छोटे से पहाड़ पर गुफाये दिखने लगी। मुझे थोड़ी परेशानी थी चलने में लेकिन धीरे धीरे मैंने फतह पा ली ऊपर जाकर विस्मय सी हो गई। गुफाये अद्भुत थी अतुलनीय भारत   
 टोटल 20 गुफाये थी कुछ गुफाये तो 4 वीं और 5 वीं सदी से जुडी थी। नंबर 1 और 20 जैन धर्म से संबंधित है ये समस्त गुफाये उत्त्खलन से निकली है  10 वीं शताब्दी में जब परमारो का राज्य था तब राजा भोज के पौत्र उदयादित्य  ने इस स्थान का नाम उदयगिरि रखा। 

उदयगिरि पहाड़ पर चढकर सारी गुफाये देखकर थकान ऐसे छूमंतर हो गई की क्या कहने फिर हमने खूब ढेरों फोटू खींचे लेकिन खंडगिरि गुफाओ तक जाने का साहस नहीं हुआ और हम नीचे उतर आये। 
नजदीक ही एक रेस्ट्रॉ में बैठकर चाय नाश्ता किया और चल पड़े आज के आखरी सफर लिंगराज  मंदिर की और  .... 

लिंगराज मंदिर ;--
लिंगराज मंदिर भगवान शिव को समर्पित है यह भुवनेशवर का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर को ललातेडुकेशरी  ने 617 - 657 ई. में बनवाया था। यह मंदिर विशाल और अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिध्य है इस मंदिर की प्रत्येक मूर्ति कारीगरी और शिल्प में बेजोड़ है।  गणेश, कार्तिकेय और गौरी के भी मंदिर बने हुए है। गौरी मंदिर में पार्वती की काले पत्थर की प्रतिमा बनी हुई है। यहाँ बिंदु सागर सरोवर बना हुआ है  और शिव के  8 फीट मोटे और एक फिट ऊँचे ग्रेनाइट पत्थर से बने शिवलिंग है। 
इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजा जजाति केशरी ने 11 वीं शताब्दी में करवाया था इस मंदिर का प्रागंड़ 150 मीटर वर्गाकार और कलस की ऊंचाई 40 मीटर है। अप्रैल के महीने में यहाँ रथ यात्रा निकलती है  
हम लिंगराज मंदिर पहुंचे तो हमारा सारा सामान मोबाईल, कैमरा वगैरा सब काउंटर पर जमा करवाना पड़ा इसलिए यहाँ का एक  भी फोटू नहीं है। 

मंदिर घुमकर अपना सामान ले हम वापस ऑटो में आ गए और अपने होटल की तरफ चल पड़े आज बहुत थक गए थे इसलिए नजदीक ही एक होटल में खाना खाकर ही अपने होटल आये और कुछ देर गप्पशप कर के सब सो गए। .. 
 कल हमको वाराणसी जाना है। .. 




 धौलीगिरि शांति स्तूप 



 धौलीगिरि शांति स्तूप 




 धौलीगिरि शांति स्तूप 



 उदयगिरि की पहाड़ी पर चढ़ती मैं  




 उदयगिरि की गुफाये 



 उदयगिरि की गुफाये 


 उदयगिरि की गुफाये 


 उदयगिरि की गुफाये 











शांति स्तूप के बहार पेड़ के निचे विश्राम 
    


 उदयगिरि की गुफाये 


दूर दिखता खंडगिरि 




जय हो उदयगिरि। ....  हेंड्सअप !!!

 उदयगिरि की गुफाये --बहार  ही बहार 



ज़ोर लगा के हाई.....शा।  खसक ही नहीं रहा :)


भगवान कृष्ण की मुद्रा में 



बगैर दरवाजें की बनी गुफ़ाएँ --बोध्य भिक्षुओं को किस का डर  




9  .  बनारस से बॉम्बे --भाग 8  










गुरुवार, 29 जून 2017

श्री हरिशर्मा जयपुर वाले


*ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले रे हम रह गए अकेले*

28 जून 2017   

आभासी दुनियां के हमारे अभिन्न मित्र,ब्लॉगर  श्री  हरिशर्मा जयपुर वाले काल के क्रूर पंजो में समां गए। आज 28 जून 2017 की मनहूश धड़ी उनको हमसे दूर ले गई।  उनके जाने के बाद वो स्थान हमेशा  ख़ाली रहेगा जिसे अब कोई नहीं भर सकता।  


इतनी भी क्या जल्दी थी 
तुमको रब से मिलने की
अभी तो पैरो के
महावर भी नही छूटे
कलाइयों की चूड़ियां भी
नही खनकी,
मेंहदी भी लगी है
हाथों में---
ओ.. दूर के मुसाफिर
तनिक, इक पल मेरा तो इंतजार करते ? 
तसव्वुर में सजा लेती !
जुड़े में छिपा लेती !!
आंखों में समा लेती !!!
या खुद ही साथ हो लेती ----
ओ... दूर के मुसाफिर
तनिक, इक पल मेरा तो इंतजार करते ?




बुधवार, 21 जून 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 6 )


*यात्रा जगन्नाथपुरी *
भाग -- 6  
भुवनेश्वर भाग-- 1 

 धोलगिरी शांति स्तूप,भुवनेश्वर   




1 अप्रैल 2017 


28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी |
हमने दो दिन खूब पुरी घूमा ,सूर्यमंदिर देखा और  भी यहाँ के अन्य धार्मिक स्थल देखे।  अब हमने भुवनेश्वर  को प्रस्थान किया ---अब आगे ----

रात को थकान  बहुत हो गई थी ,सुबह भुवनेश्वर जाना था और रास्ते में हमको पीपली गाँव भी रुकना था क्योकि वहां उड़ीसा की फ़ेमस हेंडमेंड पेंटिंग मिलती  है जिन्हे हम सबको खरीदना था  इसलिए रात को ही सबने डिसाईट किया की सड़क मार्ग से ही चलेगे। सड़क मार्ग से भुवनेश्वर 59 किलोमीटर है जबकि ट्रेन से 63 किलोमीटर। 
हमने कल ही एक ऑटो वाले को नक्की किया था जो 800 रु में हमको भुवनेश्वर छोड़कर आएगा। 

सुबह 8 बजे तक सब तैयार होकर गेस्टरूम से बाहर आये ,पैकिंग हमने रातको ही कर ली थी इसलिए काम जल्दी हो गया। अब हम कल वाले रेस्ट्रा में आ गए ताकि भारी नाश्ता कर सके अभी होटल वगैरा खुल रहे थे नाश्ता तैयार नहीं था हमने जब आलू के परांठे खाने की इच्छा बताई तो होटल के मालिक ने बड़ी रुखाई से जवाब दिया की आधा घंटा लगेगा ,मरता क्या न करता ! हम वही बैठ गए। हमने ऑटो वाले को भी यही बुला लिया था। 
मुझे यहाँ के लोग बड़े रूखे मिज़ाज के लगे। शायद इनको हिंदी भाषी लोग पसंद नहीं हो खेर,
आधा घंटे के बाद ही हमको परांठे मिले पर कल जितना मजा नहीं आया। 
परांठे खा बिल पे कर हम ऑटो  में बैठ इस शहर को अलविदा बोलै  ---जय जगन्नाथ। 



भुवनेश्वर एक परिचय ;--


भुवनेश्वर ओडिसा राज्य की राजधानी है।  यह बहुत ही हराभरा राज्य है। सुंदरता की निराली छटा बिखेरता हुआ ये राज्य इतिहास में अपना विशेष स्थान रखता है। इतिहासकारों के अनुसार यहाँ कलिंग का प्रसिध्य युध्य हुआ था,  जिसके विनाशकारी परिणाम को देखकर पराक्रमी राजा अशोक महान  ने युध्य न करने की शपथ ली और बोध्य अनुयायी बन गया था । 
भुवनेश्वर को पूर्व की काशी भी कहा जाता है  क्योकि किसी समय में यहाँ 7000 मंदिर हुआ करते थे जो अब 600 तक सिमिट गए है।
यह बोध्य स्थल भी रहा है 1000 सालों तक यहाँ बोध्य धर्म रहा जिनकी आज भी भव्य गुफाएं देखी जा सकती है। राजधानी से 100 किलोमीटर दूर  खुदाई में तीन बोध्य विहार रत्नगिरि , उदयगिरि और ललितगिरि मिले है इनमे से उदयगिरि और खंडगिरी की गुफाएं आज भी अच्छी अवस्था में है।

पुराने भुवनेश्वर के साथ ही नया भुवनेश्वर भी देखने लायक है जो एक राजधानी में होना चाहिए वो सब यहाँ है , चौड़ी सड़कें ,बिल्डिंगे,सिनेमा घर, मॉल और  फाइव स्टार होटल्स इत्यादि। 
यहाँ के खानपान में चावल मुख्य भोजन है।  उड़िया लोग मछली भी प्रेम से खाते है । पखाळ भात यहाँ की एक लोकप्रिय डिश है  और पोई - साग यहाँ के तटीय क्षेत्र में पाई जाने वाली एक सब्जी है। 

यहाँ पत्थर से बने खूबसूरत समान मिलते है पत्थर से बनी सजावटी  मूर्तियो के अलावा बर्तन भी मिलते है।उड़ीसा का नृत्य कुचिपुड़ी और यहाँ की साड़ियां भी बहुत फेमस है। 

हमारी ऑटो पीपली गाँव  रुकी जो की पूरी से 35 किलोमीटर दूर है यहाँ ओडिसा का फेमस हेंडीक्रॉफ्ट मिलता है जिसके लिए हमको सड़क मार्ग से आना पड़ा. . 

यहाँ  काफी दुकाने थी हम सामने की एक दुकान में चले गए यहाँ से हम सबने  150 रु की करीब 4  कपडे की पेंटिंग खरीदी। 
फिर हम दूसरी दुकान में गए जहाँ मेरी सहेली ने कुछ मधुबन स्टाईल की पेंटिंग्स खरीदी जो 1000 रु बोल रहा था और आखिर में 700 रु में दी ,ये भी कपड़े पर ही थी यह पेंटिंग कृष्ण पर ही बनी थी भगवान कृष्ण के जीवन की झलकियां  ऊकेरी हुई थी। 
  
यहाँ से हम आधा घंटे बाद फ्री होकर भुवनेश्वर चल पड़े। 

हमारा ऑटो वाला हमको एक होटल में छोड़कर चला  गया  हमने  डबल बेड का ऐ. सी,  रूम लिया जो 1500 सो रुपये में आया , रूम छोटा था पर कम्फर्टेबल था।  हमने सारा सामान रखा और फ्रेश होकर निकल पड़े धौलगिरि शांति स्तूप और उदयगिरि की गुफाये देखने। ... 

शेष अगले भाग में  ब्रेक के बाद मिलते है। ...... 












पीपली गांव की पेंटिंग 


 पीपली  गांव का बाजार 



      







9  .  बनारस से बॉम्बे --भाग 8  











रविवार, 28 मई 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 5 )



*यात्रा जगन्नाथपुरी*

भाग-- 5

कोणार्क मंदिर भाग --2   


ध्वज श्री जगन्नाथ मंदिर का .. फोटू गूगल बाबा  



31 मार्च 2017 

 --------------------------------



28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी | 

आज मुझको पुरी आये दो दिन हो गए ,कल हमने जगन्नाथ मंदिर देखा और पुरी के अन्य धार्मिक स्थल देखे ,शाम को हमने पुरी का समुन्दर बीच भी देखा और रात को थके हारे सो गए। ... अब आगे ----

आज हमने कोणार्क मंदिर देखा  .. और चंद्रभागा समुन्द्र बिच पर  मटरगस्ती भी की। .. दिन के 3 बज रहे थे भूख जोरो से लग रही थी सुबह के खाये परांठे पता नहीं कहाँ गुम हो चुके थे ,पर यहाँ खाने को कुछ खास नहीं था इसलिए हमने बिस्कुट और नमकीन खाकर ही काम चलाया थोड़ा सहारा तो हुआ पर इतना भी नहीं की चल सके खेर, आगे जाकर नारियल पानी पिया और नारियल की मलाई खाई।  गर्मी और धुप अपनी  चरम सीमा पर थी।   

अब आगे ;---

कोणार्क का सूर्य मंदिर देखकर हम बाहर निकले तो सामने ही बड़ा बाजार लगा हुआ था यहाँ से सबने कुछ न कुछ हैंडमेड चीजे खरीदी बहुत ही प्यारे छोटे- छोटे हाथी,घोड़े,ऊंट और हिरण बिक रहे थे मैंने भी  दो हिरण खरीदे , आगे एक दुकान पर चिड़ियों का घोंसला बिक रहा था मुझे बहुत पसंद आया एक छोटा घोंसला मैंने भी खरीदा। ..समुन्द्र की सीपों से बने घर और आईने बिक रहे थे पर वो बॉम्बे भी मिलते है , फिर हम  आँटो में बैठ आगे चल पड़े। 

आगे हमको वो एक मंदिर में ले गया जो दुर्गा माता का मंदिर था पीछे नदी थी उसमे मोटर बोट चल रही थी , मंदिर सड़क से काफी दूर और नीचे था , मैं बहुत थक गई थी इसलिए अंदर नहीं गई वही बैठकर गन्ने का रस पिया ,हमारे टीम के लीडर लोग मोटर बोट का किराया वगैरा पूछने नदी के पास चले गए।  वापसी में वो लोग मुझे  मुंह लटकाकर आते हुए दिखे ,आकर उन लोगो ने बताया की बोटिंग बहुत महंगी है हम सबका वो लोग 1500 सो रुपये मांग रहे है।  एक घंटा नदी में घुमाएंगे। .. इतना महंगा ! हमको नहीं चलेगा, सबने वही बैठकर गन्ने का जूस पिया और एक गिलास ऑटो वाले को भी पिलाया फिर हम आगे चल पड़े ....  

4.30 तक हम जगन्नाथ मंदिर पहुँच गए ,फटाफट मोबाईल , पर्स,बेल्ट और जूते हमने काउंटर पर जमा किये और मंदिर के अंदर पहुँच गए हमको 5 बजे से शुरू होने वाला ध्वज प्रोग्राम मिस नहीं करना था क्योकि हमारे घुमक्क्ड़ी ग्रुप की प्रतिमा ने बोला था की कुछ भी हो ये मिस नहीं होना चाहिए। 
हमारा मोबाईल जमा हो गया इसलिए आगे के फोटू नहीं खींच सकी.... 
पता नहीं क्यों हमारे देश में मंदिरो और पौराणिक स्थलों पर फोटू नहीं खींचने देते  ?

  
हम जल्दी ही मंदिर के अंदर पहुँच गए, अंदर काफी भीड़ थी ऊपर से धूप भी बहुत तेज थी लेकिन हवा ठंडी चल रही थी ,काफी लोग अभी से मंदिर के प्रगांढ़ में अपनी अपनी जगह रोककर बैठे थे ,हमने भी एक बढ़िया जगह रोककर वही अपनी धूनी रमा ली हलाकि धुप सीधे मुंह पर आ रही थी पर इतना त्याग तो एक बढ़िया चीज देखने के लिए करना ही था ,मेरे सामने मंदिर दिख रहा था और ऊपर लहराता ध्वज। मैं यही सोच रही थी की कैसे कोई आदमी इतने बड़े मंदिर पर उल्टा होकर चढ़ सकता है यही आश्चर्य दिखने को मन बहुत बेताब था।सबकी निगाहें ऊपर मंदिर के उड़ते हुए झंडे पर लगी थी , मैंने देखा  सचमुच् पंछी मंदिर के ध्वज के पास नहीं उड़ रहे थे ,कहते है की कोई विमान भी ऊपर से नहीं उड़ता। 

कहावत है की यदि इस मंदिर में एक दिन भी झंडा नहीं बदला तो मंदिर 18  सालो के लिए बंद हो जायेगा। 

5 बज चुके थे अचानक एक बादल का टुकड़ा सूरज महाराज को ढ़कने पहुँच गया और मेरे चेहरे पर आ रही धूप से मुझे निजात मिली मेरे दिल से एक आवाज़ निकली -- जय जगन्नाथ। 

हम जब आकर वहां बैठे थे तो कुछ बंदरो के झुण्ड पास के मंदिर पर चढ़ कर घमाचौकड़ी मचा रहे थे हम भी उनकी मस्ती देख आनंदित हो रहे थे आखिर कुछ तो टाईम पास हो। 

ठीक 5 ;20 पर ध्वज का बड़ा सा गठ्ठरा लेकर एक युवा पुजारी हमारे सामने से निकला और मंदिर पर चढने लगा धीरे  धीरे वो कंधे पर गठ्ठर उठाये हमारी तरफ देखता हुआ ऊपर चढ़ने लगा ,पूरा मंदिर छोटी -छोटी सीढ़ियों जैसा बना था वो मंदिर की सीढ़ी पकड़ता और निचे से पैर अगली सीढ़ी पर रखता और ऊपर चढ़ जाता वो धीरे -धीरे ऊपर जा रहा था और बंदरो का झुण्ड अपने आप निचे आ रहा था मानो किसी ने उनको डांट दिया  हो और ऊपर से भगा दिया हो ,देखते -देखते सारे बंदर नीचे आ गए और  युवा पंडित 45 मंजिला ऊँचा मंदिर के बुर्ज पर चढता रहा , न किसी रस्सी के सहारे न किसी चीज को पकड़े हुए ऊपर से इतना बड़ा गठ्ठर लिए;
उफ़ ! मेरे तो पैरों में सिहरन होने लगी वो दृश्य ऐसा था की हर इंसान आँखे फाडे मुंह खोले सिर्फ देख रहा था। ये दृश्य ऐसा था जिसे शब्दों में पिरोना मूर्खता है बस देखकर ही अहसास होता है। काश, मेरे पास मोबाईल होता तो ये शमा कैद कर लेती अफ़सोस !!!!

खेर, वो युवा पुजारी बड़ी निपूर्णता से अपने कार्य को अंजाम दे रह था ,मंदिर के बुर्ज पर पहुंचकर वो और ऊपर जंजीर की मदद से चढ़ने लगा अब वो हमको बहुत छोटा खिलौने की तरह नजर आ रहा था उसने ऊपर जाकर अपना काम शुरू कर दिया था वो एक -एक कर पुराने झंडे खोलता जा रहा था और उनकी वैसी ही घड़ी करता जा रहा था और कंधे पर ही रखता जा रहा था , सम्मान इतना था की उसने एक भी झंडा नीचे नहीं रखा. अब वो और ऊपर चढ़ गया जहाँ सुदर्शन चक्र लगा  हुआ था उस चक्र के ऊपर लगा सबसे बड़ा ध्वज उसने बदला और खोल कर लहरा दिया (ऊपर का चित्र देखे )  निचे सभी ने तालियां बजाई और भगवान जगन्नाथ की जय -जयकार की ,ये सारा कार्यक्रम आधा घंटा चला। ये दृश्य इतना आनंदमयी और उत्सुकतापूर्ण था की मुझे अपनी सम्पूर्ण जगन्नाथ यात्रा का आनंद इस आधे धंटे में आ गया। मेरी यात्रा सफल हो गई।    
   
वो युवा पुजारी ऊपर से नीचे बड़े आराम से उतर गया मानो सीढ़िया लगी हो जबकि उसके कंधे पर अभी भी पुराने ध्वज का गठ्ठर लदा था ,चढ़ना जितना कठिन था उतरना भी उतना ही कठिन था। जब वो नीचे आया तो श्रद्धालु उसके पैर स्पर्श करने लगे।  और वो वही मंदिर के मेन गेट के पास बैठ गया सारी भीड़ उधर ही दौड़ पड़ी मैंने उत्सुकता से उधर देखा तो लोग हाथो में पैसे लिए ध्वज खरीद रहे थे शायद छोटे बड़े 40 -50  ध्वज तो होंगे ही उस युवा पुजारी की मदद दो अन्य पुजारी भी कर रहे थे ,जब भीड़ कुछ कम हुई तो हमारे भी दोनों जग्गा जासूस उधर चल पडे और सारी रिपोर्ट आकर बताई की सबसे बड़ा ध्वज  2100 सो रुपये में बिका जो सुदर्शन चक्र पर चढ़ता है और बाकि  के 100 रु में बिक रहे थे। मुझे इस तरह ध्वज बिकना पसंद तो नहीं आया पर ठीक है मंदिर के पण्डो की आमदनी और ऊपर चढ़ने वाले पंडे की जान की कीमत से बहुत सस्ता लगा।  मैंने भी एक झंडा 100 रु में मंगवा लिया। 
बाद में हम लोग मंदिर के प्रगांढ़ में बने अन्य मंदिरो के दर्शन करने गए वहां हमने एक ग्यारस का मंदिर भी देखा जिसे खुद भगवान ने उल्टा कर दिया था और वो उलटी ही लटकी हुई थी पुरोहित कहते है की हम लोग ग्यारस का व्रत नहीं करते और ग्यारस वाले दिन जो चावल खाना निरषेध्य है पर हम लोग चावल खाते है। 

फिर हम लोग लक्ष्मी मंदिर गए वहां 4 -5 पुरोहित खड़े थे उन्होंने हमको बड़े आदर से अंदर बुलाया ,मामला गड़बड़ लग रहा था मुझे ;और था भी !
हुआ यू की हम जैसे ही अंदर गए तो हमको 3 युवा पुरोहितों ने घेर लिया ,इतने पैसे दो तो माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलेगा ,घर धन्य धान्य से भर जायेगा वगैरा -वगैरा ! पर हमने कोई इन्ट्रेस नहीं दिखाया तो वो एक चाँदी जैसा लक्ष्मी का पैर ले आये जिसका वो 200रु मांग रहे थे  मारु जी ने 100 रु बोला तो वो तैयार हो गए और उनको दे भी दिया ,तब तक मेरी सहेली बाहर निकल चुकी थी और मैंने भी कदम बढ़ाये तो एक युवा पुरोहित बोला -- ''आप इधर आये।  मैं उसके पीछे चल दी, देखना चाह रही थी की ये क्या करता है उसने एक अलमारी के पास जाकर ताला खोला और बोलने लगा की ये लीजिये ,मैंने देखा तो वो एक बड़ी-सी चाबी थी उसपर सोने का पॉलिश चढ़ा हुआ था मैंने हाथ में ले ली सोचा आज तो लक्ष्मी जी मेहरबान है पर असलियत तो तब खुली जब व पुरोहित ने 500 रु मांगे;  मैं हैरान हो गई की सोने की चाबी सिर्फ 500 रु में ! फिर ध्यान से देखा तो पता चला की ये तो प्लास्टिक की 20 रु वाली चाबी है धत तेरी की ----
 बाद में जब मैंने नहीं खरीदी तो वो पुरोहित 300 रु मांगने लगा --- अब तक मैं उसके जादू  से दूर आ चुकी थी।          

 दिनभर के भूखे थे अब भूख से आंते भी कुलबुलाने लगी तो हम फटाफट मंदिर से बहार आये  पहले अपना सामान समेटा और मंदिर के सामने जाकर ठेले की चाय -बिस्किट खाई फिर पास ही मिल रही वहां की स्पेशल दही मिठाई खाई जो बहुत टेस्टी थी।रात हो आई थी और हम बहुत थक गए थे।  

हम लोगो ने मंदिर से  ऑटो लिया और सीधे सुबह वाले रेस्टोरेंट आ गए और जमकर खाना खाया फिर पैदल ही अपने गेस्टहाउस आ गए... आज बहुत थक गए थे पर आजका दिन पूरा सार्थक हुआ कल भुवनेश्वर के लिए निकलना है .. 
शेष अगले अंक में ....    

   



लाल निशान से युवा पुजारी मंदिर के ऊपर सीधा ही चढ़ने लगा ,मानो सीढ़ियां लगी हो 
चित्र -- गूगल दादा  






सुदर्शन चक्र 





पुराना जगन्नाथ टेम्पल 










चिड़ियों का घोंसला 


दो सुंदर हिरण 

रास्ते के टेस्टी नारियल पानी और मलाई 

शेष अगले अंक में 
भुवनेश्वर की यात्रा 

8. यात्रा बनारस की
9.  बनारस से बॉम्बे --